राष्ट्रीय पंचायती राज दिवस ( National Panchayati Raj Day) प्रत्येक वर्ष 24 अप्रॅल को मनाया जाता है।

भारतीय लोकतंत्र और पंचायतराज व्यवस्था

भारत की प्राचीन सामाजिक व्यवस्था का आधार पंचायत रही है तो आधुनिक भारतीय लोकतंत्र का भविष्य भी पंचायतराज ही है। इसलिए ग्रामीण समाज में पंचायतराज व्यवस्था भारतीय समाज के लिए न केवल राजनीतिक और आर्थिक संरचना का मंच है बल्कि विकेंद्रित विकास की समाज व्यवस्था का यह ताना-बाना भी है। इसलिए हमने पंचायतीराज को न केवल भारतीय संविधान में प्रारंभ से ही धारा 40 के अंतर्गत स्थान दिया बल्कि 73वें संविधान संशोधन के द्वारा उसे और मजबूती प्रदान की किंतु अभी भी हमारी पंचायतराज व्यवस्था इतनी प्रभावी है कि ग्रामसभा का कोरम भी पूरा नहीं हो पाता। इसलिए पंचायतराज व्यवस्था अपने प्रबंधन-यथार्थ को लेकर चिंतनीय है।
पंचायती राज व्यवस्था में ग्राम, तहसील, तालुका और ज़िला आते हैं। भारत में प्राचीन काल से ही पंचायती राजव्यवस्था अस्तित्व में रही है, भले ही इसे विभिन्न नाम से विभिन्न काल में जाना जाता रहा हो। पंचायती राज व्यवस्था को कमोबेश मुग़ल काल तथा ब्रिटिश काल में भी जारी रखा गया। ब्रिटिश शासन काल में 1882 में तत्कालीन वायसराय लॉर्ड रिपन ने स्थानीय स्वायत्त शासन की स्थापना का प्रयास किया था, लेकिन वह सफल नहीं हो सका। ब्रिटिश शासकों ने स्थानीय स्वायत्त संस्थाओं की स्थिति पर जाँच करने तथा उसके सम्बन्ध में सिफ़ारिश करने के लिए 1882 तथा 1907 में शाही आयोग का गठन किया। इस आयोग ने स्वायत्त संस्थाओं के विकास पर बल दिया, जिसके कारण 1920 में संयुक्त प्रान्त, असम, बंगाल, बिहार, मद्रास और पंजाब में पंचायतों की स्थापना के लिए क़ानून बनाये गये। स्वतंत्रता संघर्ष के दौरान भी संघर्षरत लोगों के नेताओं द्वारा सदैव पंचायती राज की स्थापना की मांग की जाती रही।

पंचायतीराज की कार्य-प्रक्रिया

पंचायतीराज व्यवस्था से आम जनता में शासन के प्रति रुचि जाग्रत होती है, शासकीय शक्तियों एवं कार्यों का ग्राम स्तर तक विकेंद्रीकरण होता है। आम जनता को राजनीतिक अधिकारों के लिए शिक्षित करती है, जनता एवं शासन के बीच की दूरी कम करती है, राजनीति की अन्य संस्थाओं-विधानसभा एवं लोकसभा के लिए जन-प्रतिनिधियों को अनुभव प्रदान करती है। इस प्रकार पंचायतीराज व्यवस्था लोकतांत्रिक व्यवस्था को विकसित एवं मजबूत करने की सहज, स्वाभाविक प्रक्रिया है। दरअसल यह लोकतंत्र की पहली और आधारभूत राजनीतिक पाठशाला है।

73वाँ संविधान संशोधन अधिनियम

भारतीय संविधान में 73rd संविधान संशोधन अधिनियम (73rd Amendment Act) ने एक नया भाग IX सम्मिलित किया है. इसे The Panchayats नाम से उल्लेखित किया गया और अनुच्छेद 243 से 243(O) के प्रावधान सम्मिलित किये गए. इस कानून ने संविधान में एक नयी 11वीं अनुसूची भी जोड़ी. इसमें पंचायतों की 29 कार्यकारी विषय वस्तु हैं. इस कानून ने संविधान के 40वें अनुच्छेद को एक प्रयोगात्मक आकार दिया जिसमें कहा गया है कि – “ग्राम पंचायतों को व्यवस्थित करने के लिए राज्य कदम उठाएगा और उन्हें उन आवश्यक शक्तियों और अधिकारों से विभूषित करेगा जिससे कि वे स्वयं-प्रबंधक की ईकाई की तरह कार्य करने में सक्षम हो.” यह अनुच्छेद राज्य के नीति निदेशक तत्वों का एक महत्त्वपूर्ण हिस्सा है.
इस अधिनयम ने पंचायती राजसंस्थाओं को एक संवैधानिक दर्जा दिया अर्थात् इस अधिनियम के प्रावधान के अनुसार नई पंचायतीय पद्धति को अपनाने के लिए राज्य सरकार संविधान की बाध्यता के अधीन है. अतः राज्य सरकार की इच्छा पर न तो पंचायत का गठन और न ही नियमित अंतराल पर चुनाव होना निर्भर करेगा.

73वाँ संशोधन अधिनियम की विशेषताएँ

इस 73वाँ संशोधन अधिनियम (73rd Amendment Act), 1993 द्वारा संविधान में एक नया भाग, भाग IX और नई अनुसूची 11वीं अनुसूची जोड़ी गई है और पंचायत राज व्यवस्था को संवैधानिक दर्जा प्रदान किया गया है. इस अधिनियम की निम्नलिखित प्रमुख विशेषताएँ हैं –

ग्राम सभा
पंचायतों का गठन
चुनाव
आरक्षण
सदस्यों की योग्यताएँ
विषयों का हस्तांतरण

ग्राम सभा

ग्राम सभा गाँव के स्तर पर ऐसी शक्तियों का प्रयोग करेगी और ऐसे कार्यों को करेगी जो राज्य विधानमंडल विधि बनाकर उपलब्ध करें.
पंचायतों का गठन

अनुच्छेद 243ख त्रिस्तरीय पंचायती राज का प्रावधान करता है. प्रत्येक राज्य ग्राम स्तर, मध्यवर्ती स्तर और जिला स्तर पर पंचायती राज संस्थाओं का गठन किया जायेगा, किन्तु उस राज्य में जिसकी जनसंख्या 20 लाख से अधिक नहीं है, मध्यवर्ती स्तर पर पंचायतों का गठन करना आवश्यक नहीं होगा.

पंचायती राज चुनाव

पंचायत स्तर पर सभी ग्राम पंचायतों का चुनाव प्रत्यक्ष रूप से होगा और जिला परिषद् के स्तर पर अप्रत्यक्ष चुनाव होगा. मध्यवर्ती स्तर की संख्या के अध्यक्ष का चुनाव प्रयत्क्ष हो या अप्रत्यक्ष यह बात सम्बंधित राज्य सरकार द्वारा निश्चित की जाएगी. हर पंचायती निकाय की अवधि पाँच साल की होगी. यदि प्रदेश की सरकार 5 साल पूरे होने से पहले पंचायत को भंग करती है तो इसके 6 महीने के भीतर नए चुनाव हो जाने चाहिए. निर्वाचित स्थानीय निकायों के अस्तित्व को सुनिश्चित रखने वाला यह महत्त्वपूर्ण प्रावधान है. 73 वें संशोधन (73rd Amendment)से पहले कई प्रदेशों से पहले कई प्रदेशों में जिला पंचायती निकायों के चुनाव अप्रत्यक्ष रीति से होते थे और पंचायती संस्थाओं को भंग करने के बाद तत्काल चुनाव कराने के सम्बन्ध में कोई प्रावधान नहीं था.

पंचायती राज – आरक्षण

पंचायती राज संस्थाओं के कुल स्थानों में 1/3 स्थान महिलाओं के लिए आरक्षित हैं और अनुसूचित जाति और जनजाति के लिए उनकी जनसंख्या के अनुपात के आधार पर स्थान आरक्षित होंगे. यदि प्रदेश सरकार जरुरी समझे, तो वह अन्य पिछड़ा वर्ग को भी सीट में आरक्षण दे सकती हैं. तीनों ही स्तर पर अध्यक्ष (Chairperson) पद तक आरक्षण दिया गया है.

सदस्यों की योग्यताएँ

सदस्यों की योग्यताएँ

पंचायत का सदस्य निर्वाचित होने के लिए निम्न योग्यताएँ (eligibility) आवश्यक होंगी –

नागरिक  ने 21 वर्ष की आयु प्राप्त कर ली हो.
वह व्यक्ति प्रवृत्त विधि के अधीन राज्य विधानमंडल के लिए निर्वाचित होने की योग्यता (आयु के अतिरिक्त अन्य योग्यताएँ) रखता हो.
वह सम्बंधित राज्य विधानमंडल द्वारा निर्मित विधि के अधीन पंचायत का सदस्य निर्वाचित होने के योग्य हो.

विषयों का हस्तांतरण

ऐसे 29 विषय जो पहले राज्य सूची में थे, अब पहचान कर संविधान की 11वीं अनुसूची में दर्ज कर लिए गए हैं. इन विषयों को पंचायती राज संस्थाओं को हंस्तारित किया गया है. अधिकांश मामलों में इन विषयों का सम्बन्ध स्थानीय स्तर पर होने वाले विकास और कल्याण के कामकाज से है. इन कार्यों का वास्तविक हस्तांतरण प्रदेश के कानून पर निर्भर है. हर प्रदेश यह फैसला करेगा कि इन 29 विषयों में से कितने को स्थानीय निकायों के हवाले करना है. वस्तुतः पंचायतें 11वीं अनुसूची में वर्णित विषयों और कृषि, भूमि सुधार, भूमि विकास, पेयजल, ग्रामीण बिजलीकरण, प्रौढ़ शिक्षा, महिला और बाल विकास, दुर्बल वर्गों का कल्याण आदि के माध्यम से सामजिक-आर्थिक परिवर्तन का प्रयास कर सकती है.

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